SIR कोलकाता:
SIR:- जहाँ दिल्ली में Election Commission of India (EC) ने देश भर में मतदाता-सूची (voter list) को “पड़ताल, सफाई और पुनर्स्थापन” के लिए एक बड़ी मुहिम शुरू की है — वहीं West Bengal में इस प्रक्रिया को राजनीतिक रंग चढ़ते जा रहे हैं। इस प्रक्रिया को कहा जा रहा है SIR — “Special Intensive Revision” — जो सिर्फ प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि चुनाव के पूर्व एक बड़ी लड़ाई का मैदान भी बनता जा रहा है।
SIR क्या है और क्यों लागू हो रहा है
पश्चिम बंगाल में यह अभियान इसलिए जोर पकड़ रहा है क्योंकि आयोग का मानना है कि यहाँ मतदाता सूची में “अवैध प्रवासी”, “घोस्ट वोटर”, या पुराने लिस्ट में ऐसे नाम हो सकते हैं जो अब वहाँ नहीं रहते या मृत हो चुके हैं।
SIR, यानी Special Intensive Revision of Electoral Rolls, एक ऐसा अभियान है जिसमें एक राज्य (या देश में) मतदाता सूची को पुनः व्यवस्थित किया जाता है — पुराने डेटा से मिलान, डुप्लीकेट हटाना, निवास परिवर्तन देखना, और सुनिश्चित करना कि सभी योग्य मतदाता सूची में हों।
विवाद के कारण
- विपक्षी दलों का तर्क है कि इस SIR प्रक्रिया का समय-सीमा बहुत संकीर्ण है, दस्तावेज़ की माँग काफी कड़ी है, और यह एक तरह से मतदाता के अधिकार को कमज़ोर कर सकती है।
- एक बड़ी चिंता यह है कि यदि genuine मतदाता (वास्तविक निवासी, नागरिक) का नाम गलती से हट जाता है या सूची में नहीं है, तो वह मतदान नहीं कर पाएगा — जिससे लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
- कुछ नेताओं का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया राजनीतिक एजेंडा से प्रेरित है — उदाहरण के लिए, Bharatiya Janata Party (बीजेपी) द्वारा “1 – 1.2 करोड़ नाम हटेंगे” जैसा दावा किया जाना।
- वहीं All India Trinamool Congress (TMC) का कहना है कि यह काम ‘मोदी-सरकार के एजेंडा’ को आगे बढ़ाने के लिए हो रहा है, और इसमें नागरिकों की असुरक्षा उत्पन्न हो रही है।
कौन क्या कह रहा है
- Mamata Banerjee ने साफ कह दिया है कि बंगाल में एक भी परिवार का नाम हटने नहीं दिया जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो वे खुद विरोध करेंगी।
- दूसरी ओर, EC का कहना है कि इस प्रक्रिया का लक्ष्य है एक “100 % निष्पक्ष मतदाता सूची” बनाना — जिसमें कोई वास्तविक मतदाता नाम कटने नहीं देगा।
- विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि यह SIR प्रक्रिया बहुत जल्दी में शुरू की जा रही है, दस्तावेज़-आधार बहुत सख्त हैं, और समय कम है — जिससे सामान्य नागरिक परेशान हो सकते हैं।
प्रक्रिया की गति और वक्त
बंगाल में EC ने तय किया है कि SIR को लगभग 100 दिनों में पूरी किया जायेगा, ताकि अगले विधानसभा चुनाव (मई 2026) से पहले सूची तैयार हो सके।
लेकिन कई जिलों में डेटा मैचिंग अभी अधूरी है — जैसे कि 2002 की सूची और 2025 की सूची को मिलाने का काम लंबित है। EC ने अवधि बढ़ाकर 18 अक्टूबर कर दी है।
आम नागरिकों को क्या देखना है
- जल्द-बाजी में डॉक्यूमेंट जमा करना, नाम मिलना या नहीं मिलना, बूथ-स्थिति में बदलाव होना — ये सब संकेत हैं कि प्रक्रिया पारदर्शी हो रही है या नहीं।
- यदि आपका नाम सूची में नहीं है, तो तुरंत कार्रवाई करें — फॉर्म भरें, शिकायत करें। क्योंकि नियम कह रहे हैं कि सही नाम हो तो मतदाता भाग ले सके।
- राजनीतिक तौर पर यह जरूरी है कि सवाल पूछे जाएँ — क्या इस प्रक्रिया में सिर्फ गलत नाम हटाए जा रहे हैं या “वोट देना चाहने वाले लोगों” से भी नाम हटने का डर है?
ये भी पढ़ें
Sir in west bengal: Voter List Revision क्या बंगाल का हर वोटर सुरक्षित है?
बंगाल में SIR एक तकनीकी प्रक्रिया से कहीं आगे जा रहा है — यह लोकतंत्र की जड़ों से जुड़ा मामला बन गया है। यदि यह प्रक्रिया निष्पक्ष, विस्तृत और समय-सारिणी के अनुरूप होगी, तो यह मतदान को विश्वसनीय बनाएगी। लेकिन यदि यह प्रक्रिया लापरवाही, जल्दबाज़ी, या राजनीतिक दबाव से प्रभावित हुई — तो यह उत्तर दे सकती है कि वोटर नाम कटे या न कटे, लेकिन लोकतंत्र की आवाज़ कमज़ोर हो सकती है।
वोटर के लिए यही वक्त है कि वह जागरूक हो जाए — क्योंकि चुनावी लड़ाई सिर्फ पार्टियों की नहीं, आपकी आवाज़ की भी है।





