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Navratri 2025 day 3: माँ चंद्रघंटा की उपासना से मिलता है साहस और शांति

On: September 23, 2025 9:42 PM
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Navratri 2025 day 3, maa chandraghanta
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Navratri 2025 day 3

Navratri 2025 day 3:- शारदीय नवरात्रि का तीसरा दिन माँ दुर्गा के तीसरे स्वरूप माँ चंद्रघंटा को समर्पित होता है। नवरात्रि का हर दिन एक विशेष देवी रूप की आराधना के लिए माना जाता है, और यह दिन भय, नकारात्मकता और असुरों से मुक्ति का प्रतीक है। माँ चंद्रघंटा के स्वरूप में शक्ति और करुणा का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यही कारण है कि नवरात्रि का तीसरा दिन भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

माँ चंद्रघंटा का स्वरूप

माँ चंद्रघंटा का नाम उनके माथे पर सुशोभित अर्धचंद्र से पड़ा, जो घंटे की तरह प्रतीत होता है। यह स्वरूप चेतना, जागृति और दिव्य आभा का प्रतीक है। माता के दस हाथ हैं और हर हाथ में एक शस्त्र धारण है, जैसे त्रिशूल, गदा, तलवार, धनुष-बाण और कमंडल। कुछ हाथ वरमुद्रा और अभयमुद्रा में भी होते हैं, जो भक्तों को आशीर्वाद और सुरक्षा का संदेश देते हैं। उनका वाहन सिंह है, जो साहस और निर्भयता का प्रतीक है। देवी का शरीर सुनहरी आभा से युक्त बताया जाता है और उनका चेहरा शांत, किंतु दृढ़ता से भरा हुआ है।

यह स्वरूप यह स्पष्ट करता है कि माँ चंद्रघंटा केवल रक्षक ही नहीं, बल्कि साधकों के लिए मार्गदर्शक भी हैं। वे युद्ध में असुरों का विनाश करती हैं और भक्तों को भय, अज्ञानता और नकारात्मक शक्तियों से मुक्त कर उनका जीवन प्रकाशमय बनाती हैं।

कथा और अवतार का कारण

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवी पार्वती ने भगवान शिव से विवाह किया, तो उन्होंने संसार के कल्याण हेतु अपने इस विशेष रूप को धारण किया। विवाहोपरांत माँ पार्वती ने जब यह रूप धारण किया, तो उनके माथे पर स्थित अर्धचंद्र घंटे की तरह दिखाई दिया और उनकी उपस्थिति से ऐसा प्रतीत होता था मानो पूरी सृष्टि एक विशेष ध्वनि से गूंज रही हो। यह ध्वनि असुरों और नकारात्मक शक्तियों को भयभीत कर दूर कर देती थी।

माँ चंद्रघंटा का यह स्वरूप इस तथ्य को भी प्रकट करता है कि जीवन में जहां करुणा और शांति आवश्यक है, वहीं समय आने पर साहस और पराक्रम भी दिखाना पड़ता है। उनका उद्देश्य भक्तों को भयमुक्त करना और उन्हें यह विश्वास दिलाना है कि जब तक माँ की कृपा है, कोई भी शक्ति उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती।

माँ चंद्रघंटा की पूजा-विधि

नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा विशेष विधि से की जाती है।

  • सुबह स्नान कर शुद्ध होकर भक्त माँ की प्रतिमा या चित्र को पवित्र स्थान पर स्थापित करते हैं।
  • कलश स्थापना की जाती है और जल, दूर्वा, अक्षत, रोली, मौली और सुपारी से कलश को सजाया जाता है।
  • माता को पंचामृत—दूध, दही, घी, शहद और गंगा जल—से स्नान कराया जाता है और तत्पश्चात सिंदूर, चंदन और हल्दी से श्रृंगार किया जाता है।
  • लाल और पीले फूलों से माता की पूजा की जाती है, क्योंकि ये रंग शक्ति और शुभता के प्रतीक हैं।
  • भोग के रूप में दूध से बने व्यंजन, खीर, मिश्री, गुड़ और फल अर्पित किए जाते हैं।
  • पूजा के दौरान भक्त “ॐ देवी चंद्रघण्टायै नमः” मंत्र का जाप करते हैं।
  • अंत में आरती कर भक्त अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं और दिनभर उपवास रखते हैं।

इस दिन का व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसे मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्ति का साधन भी माना जाता है।

पूजा का फल और महत्व

माँ चंद्रघंटा की उपासना करने से भक्तों के जीवन में साहस और निर्भयता का संचार होता है। ऐसा माना जाता है कि उनकी कृपा से सभी प्रकार के भय और रोग दूर होते हैं। जो साधक नियमित रूप से इस दिन व्रत और पूजा करते हैं, उनके जीवन में शांति और स्थिरता बनी रहती है।

यह भी कहा जाता है कि माँ चंद्रघंटा की कृपा से साधकों को अलौकिक ध्वनियाँ सुनाई देने लगती हैं और वे आध्यात्मिक रूप से ऊँचाई प्राप्त करते हैं। उनके आशीर्वाद से व्यक्ति का मन एकाग्र होता है और उसे आत्मिक शांति प्राप्त होती है।

आध्यात्मिक महत्व

माँ चंद्रघंटा का स्वरूप रजस और सत् गुणों का मिश्रण है। यह हमें यह संदेश देता है कि जीवन में केवल भोग या त्याग ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि संतुलन बनाना सबसे आवश्यक है। उनका यह रूप साधकों को यह शिक्षा देता है कि जब तक आत्मा में सजगता नहीं होगी, तब तक भय और अज्ञानता से मुक्ति संभव नहीं है।

भक्त जब माँ चंद्रघंटा की आराधना करते हैं, तो उनके भीतर नकारात्मक विचार धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं। यह रूप साधक को आत्मविश्वासी और दृढ़ बनाता है।

प्रतीकात्मक अर्थ

  • माथे का अर्धचंद्र समय और परिवर्तन का प्रतीक है।
  • घंटी जैसी आकृति चेतना और नकारात्मक शक्तियों को दूर करने का संकेत है।
  • सिंह या बाघ का वाहन निडरता और शक्ति को दर्शाता है।
  • हाथों में धारण किए गए शस्त्र अन्याय और पाप का नाश करने की क्षमता का प्रतीक हैं।
  • उनकी वरमुद्रा और अभयमुद्रा भक्तों को यह संदेश देती है कि जो भी सच्चे मन से उनकी शरण में आता है, उसे कभी निराशा नहीं मिलती।

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निष्कर्ष

नवरात्रि का तीसरा दिन भक्तों के लिए साहस, जागृति और शांति का प्रतीक है। माँ चंद्रघंटा का स्वरूप हमें यह सिखाता है कि जीवन में भय और अज्ञानता का स्थान नहीं होना चाहिए। यदि श्रद्धा और विश्वास के साथ माँ की आराधना की जाए, तो हर कठिनाई दूर होती है और जीवन सफलता और समृद्धि की ओर बढ़ता है।

भक्तों के लिए यह दिन विशेष महत्व रखता है, क्योंकि माँ चंद्रघंटा का आशीर्वाद उन्हें न केवल बाहरी भय से मुक्ति देता है, बल्कि उनके भीतर भी आत्मविश्वास और शांति का संचार करता है। यही कारण है कि नवरात्रि के तीसरे दिन की पूजा को अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।

Sumrit Shaw

Sumrit Shaw sindhkhabar.com के एक युवा और ऊर्जावान हिंदी पत्रकार व कंटेंट क्रिएटर हैं। वे निष्पक्ष और गहराईपूर्ण खबरों के लिए जाने जाते हैं। समसामयिक विषयों, राजनीति और समाजिक मुद्दों पर उनकी लेखनी हमेशा तथ्यपूर्ण व पाठकों के लिए उपयोगी रहती है।

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