लद्दाख हिंसा
लद्दाख हिंसा— लद्दाख की राजधानी लेह में 24 सितंबर को हुई हिंसक घटनाओं के बाद केंद्र सरकार ने पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को गिरफ्तार किया है। उन पर NSA (राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम) के तहत कार्रवाई की गई है। सरकार का आरोप है कि वांगचुक के भाषणों और उकसावे वाले बयानों ने शांतिपूर्ण आंदोलन को हिंसा की ओर मोड़ दिया।
पर सवाल यह है कि क्या वह सचमुच दोषी हैं, या उन्हें राजनीतिक दबाव व दोषारोपण की रणनीति का हिस्सा बनाया गया है? आइए इस विवाद को पाँच प्रमुख बिंदुओं में समझें:
1. हिरासत और कानूनी कार्रवाई
- 26 सितंबर को लेह पुलिस ने सोनम वांगचुक को गिरफ्तार किया। यह गिरफ्तारी 24 सितंबर को हुई हिंसक झड़पों के बाद की गई थी, जिसमें चार लोगों की मौत हुई और लगभग 80 लोग घायल हुए।
- उसी दिन गृह मंत्रालय (MHA) ने वांगचुक की संस्था SECMOL का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया — आरोप लगाया कि विदेशी फंडिंग से कानून का उल्लंघन हुआ।
- गिरफ्तारी के बाद सोशल मीडिया पर #ReleaseSonamWangchuk और #SonamWangchukTraitor समेत हैशटैग ट्रेंड करने लगे।
यह कार्रवाई सरकार की ओर से अत्यंत संवेदनशील कदम मानी जा रही है, क्योंकि NSA के तहत गिरफ्तारी सीधे यह संकेत देती है कि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा माना गया है।
2. लोकतांत्रिक कार्यकर्ता से “उकसावे का आरोपित” तक
सोनम वांगचुक पहले मुख्य रूप से एक सामाजिक और पर्यावरणीय कार्यकर्ता रहे हैं। उन्हें SECMOL जैसे शैक्षिक और पर्यावरण संबंधी पहलों से पहचान मिली।
लेकिन अब उन्हें एक “राजनीतिक उकसावे” का आरोपी बताया जा रहा है। केंद्र का आरोप है:
- उन्होंने भाषणों में “अरब स्प्रिंग” और “नेपाल के युवा विद्रोह” जैसे उदाहरण दिए जो युवाओं को भड़काने वाला संदेश हो सकते थे।
- एक दावे के अनुसार, वे हिंसा भड़काने के लिए भीड़ को निर्देशित करने का काम कर रहे थे।
- सरकार का तर्क है कि आंदोलन की मांगें छठी अनुसूची और राज्य व्यवस्था की सीमाओं को चुनौती देती हैं, जिससे देश की सुरक्षा और नियंत्रण पर खतरा हो सकता है।
इससे यह प्रश्न खड़ा हो जाता है कि क्या एक सामाजिक-राजनीतिक वक्ता पर हिंसा की जवाबदेही ठहराना उचित है, या यह अभियोजन का राजनीतिक प्रयोग है?
3. आंदोलन की शुरुआत और हिंसा की क्रांति
- आंदोलन मूलतः शांतिपूर्ण था — वांगचुक और समर्थक लोगों ने लेह से दिल्ली की पैदल यात्रा की, लगातार छठी अनुसूची और राज्यवर्ग की मांग उठाई।
- लेकिन 24 सितंबर को युवाओं (Generation Z) के नेतृत्व में आंदोलन हिंसक मोड़ पर पहुंचा। भाजपा कार्यालय जला दिया गया, पुलिस वाहन और अन्य सरकारी इमारतों को निशाना बनाया गया। पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और फायरिंग विधि की।
- वांगचुक ने तुरंत हिंसा की निंदा की और शांति की अपील की, लेकिन केंद्र सरकार का दावा है कि उन्होंने स्थिति संभालने में सक्रियता नहीं दिखाई और भीड़ को नियंत्रण करने का प्रयास नहीं किया।
इसमें एक विवाद यह भी है कि कब शांतिपूर्ण प्रदर्शन हिंसक चरण में बदलता है — और किसकी भूमिका उसमें निर्णायक होती है?
4. विदेशी फंडिंग और संगठनात्मक आरोप
सरकार ने वांगचुक और उनकी संस्था SECMOL के खिलाफ यह आरोप रखा है:
- SECMOL के FCRA लाइसेंस को रद्द किया गया, क्योंकि कथित तौर पर उन्होंने विदेशी फंडिंग के नियमों का उल्लंघन किया।
- आरोप है कि उन्होंने स्वीडिश संगठन Framtidsjorden से पैसे लिए; HIAL (Himalayan Institute of Alternatives, Ladakh) को दिए गए अनुदान और उनकी निजी फर्म Sheshyon Innovations को ट्रांसफर की गई राशि है।
- सरकार कह रही है कि ये फंडिंग गतिविधियाँ राष्ट्रीय संप्रभुता और असली उद्देश्य पर खतरा हो सकती हैं।
- वांगचुक ने इस पर जवाब दिया कि ये “व्यवसायिक लेन-देन” हैं और उन्होंने आयकर अदा की है।
यह मामला यह दर्शाता है कि आंदोलन से जुड़े सामाजिक संगठनों को कैसे संवैधानिक और वित्तीय कानूनों के दायरे में आंका जाता है।
5. पाकिस्तान यात्रा और संप्रभुता के सवाल
एक और गंभीर आरोप यह है कि सोनम वांगchuk ने पिछले वर्ष पाकिस्तान में एक जलवायु सम्मेलन में भाग लिया था। इस पर यह संदेह लगाया गया है कि वह कहीं ना कहीं विदेशी एजेंसियों या प्रतिद्वंदी देशों की influence में काम कर रहे हों।
- भाजपा के नेताओं ने कहा कि वांगchuk और कांग्रेस विदेशी एजेंसियों से प्रेरित हो सकते हैं, और उनके आंदोलन का मकसद सीमा पर अशांति फैला देना हो सकता है।
- सरकार ने यह तर्क दिया है कि ऐसा यात्रा और भागीदारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील है, खासकर ऐसी जगह जहां चीन, पाकिस्तान जैसे देशों के पास सीमा है।
- वांगचुक का जवाब है कि वह यह यात्रा “पर्यावरण विषयों” पर भाग लेने गए थे, न कि राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने।
यह आरोप लोगों में संशय जगाते हैं कि आंदोलन केवल स्थानीय अधिकारों की मांग है या उसमें विदेशी पाले में झुकाव है।
निष्कर्ष: दोषी कौन — सवाल अधूरा
AajTak के इस विश्लेषण लेख में जिस तरह से पांच बहुस्तरीय आरोप व तथ्यों की व्याख्या की गई है, वह यह दर्शाती है कि मामला इतना सरल नहीं है।
- अगर हम सरकार की दलीलों को मान लें— तब वांगचुक को दोषी ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने भाषणों से भीड़ को हिंसा की ओर मोड़ा।
- लेकिन यदि हम यह देखें कि आंदोलन की जड़ों में किन्हीं वर्षों की उपेक्षा, विकास की कमी, स्थानीय संस्थाओं की कमजोर होती स्थिति आदि हैं — तो दोष लेना और देना दोनों ही जटिल हो जाते हैं।
- गिरफ्तारियाँ, FCRA लाइसेंस रद्द करना, NSA का उपयोग आदि—all ये कदम बतलाते हैं कि सरकार इस आंदोलन को राष्ट्रीय सुरक्षा फ्रेमवर्क में ले आना चाह रही है।
- पर दस्तावेजी साक्ष्य, CCTV फुटेज, संवाद रिकॉर्ड, गवाहियाँ — इन सब पर कार्रवाई होनी चाहिए ताकि निष्पक्ष जाँच हो सके।
इसलिए, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि “सोनम वांगचुक दोषी हैं” या नहीं। लेकिन यह स्पष्ट है कि केंद्र सरकार ने उन्हें इस विवाद का मुख्य टारगेट बना लिया है, और आने वाले दिनों में न्यायालय, उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की जांच बड़ी लड़ाई होगी।





