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First day of Navratri 2025 : नवरात्रि के पहले दिन पूजे जाने वाले माँ शैलपुत्री का स्वरूप, कथा, महत्व और माँ शैलपुत्री की पूजा-विधि

On: September 21, 2025 9:00 PM
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First day of Navratri 2025
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First day of Navratri 2025

First day of Navratri 2025:_शारदीय नवरात्रि की शुरुआत प्रतिपदा तिथि से होती है। इस दिन माँ दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री की पूजा की जाती है। “शैलपुत्री” शब्द का अर्थ है “पर्वतराज हिमालय की पुत्री”। इन्हें नवदुर्गा में पहला स्थान प्राप्त है और इनकी पूजा के बिना नवरात्रि का शुभारंभ अधूरा माना जाता है।

माँ शैलपुत्री का स्वरूप

नवरात्रि के प्रथम दिन पूजी जाने वाली माँ दुर्गा का पहला रूप शैलपुत्री है। “शैल” का अर्थ पर्वत और “पुत्री” का अर्थ बेटी होता है, अर्थात् पर्वतराज हिमालय की पुत्री।
माँ शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत भव्य और तेजस्वी है –

  • वे सफ़ेद वस्त्र धारण करती हैं, जो पवित्रता और सादगी का प्रतीक है।
  • उनका वाहन वृषभ (बैल) है, जो धैर्य, परिश्रम और धर्म का प्रतीक है।
  • दाहिने हाथ में त्रिशूल होता है, जो साहस और शक्ति का प्रतीक है।
  • बाएँ हाथ में कमल पुष्प सुशोभित रहता है, जो निर्मलता और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक है।
  • उनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है, जो मन की शांति और भावनाओं के संतुलन का द्योतक है।

माँ शैलपुत्री मूलाधार चक्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। साधक जब इनकी साधना करता है तो उसकी साधना की नींव मजबूत होती है और उसमें आगे के आध्यात्मिक विकास के लिए शक्ति उत्पन्न होती है।

माँ शैलपुत्री की कथा

पुराणों में वर्णन आता है कि माँ शैलपुत्री का जन्म सती के रूप में हुआ था।

  • सती और भगवान शिव का विवाह
    सती, प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं और भगवान शिव को अपना पति रूप में प्राप्त किया। दोनों का दांपत्य जीवन आनंदमय था।
  • दक्ष का अहंकार और यज्ञ
    लेकिन दक्ष शिवजी से अप्रसन्न रहते थे क्योंकि शिवजी को वे साधारण और तपस्वी मानते थे। एक बार दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया और उसमें सभी देवताओं को आमंत्रित किया, परंतु भगवान शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया।
    इसके बावजूद सती पिता के घर गईं, जहाँ उन्होंने देखा कि यज्ञ में सभी देवताओं का स्वागत हुआ लेकिन भगवान शिव का अपमान किया जा रहा है।
  • सती का आत्मदाह
    पिता द्वारा अपने पति का अपमान देख सती अत्यंत व्यथित हुईं। उन्होंने अपमान सहना उचित नहीं समझा और यज्ञ वेदी पर ही आग में कूदकर आत्मदाह कर लिया।
  • शिव का क्रोध और तांडव
    सती की मृत्यु से क्रोधित होकर भगवान शिव ने विराट तांडव किया और सती के जले हुए शरीर को अपने कंधे पर लेकर घूमने लगे। इससे सृष्टि संतुलन बिगड़ने लगा। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंड-खंड कर दिया। यही खंड आगे चलकर 51 शक्तिपीठों के रूप में विख्यात हुए।
  • शैलपुत्री के रूप में पुनर्जन्म
    सती ने अगला जन्म हिमालय के घर लिया और शैलपुत्री कहलायीं। आगे चलकर उन्होंने पुनः कठोर तपस्या द्वारा भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया।

इस प्रकार माँ शैलपुत्री का अवतार भक्ति, आत्मबल और संकल्प का प्रतीक है।

अवतार लेने का कारण और उद्देश्य

सती ने शिवभक्ति और पति धर्म की रक्षा के लिए पुनर्जन्म लिया। शैलपुत्री अवतार का उद्देश्य था—

  • भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त करना।
  • संसार को आत्मसंयम, तपस्या और भक्ति का महत्व समझाना।
  • यह संदेश देना कि सच्ची निष्ठा और दृढ़ संकल्प से हर लक्ष्य संभव है।

माँ शैलपुत्री की पूजा-विधि

नवरात्रि के पहले दिन इनकी पूजा विशेष विधि-विधान से की जाती है।

  1. कलश स्थापना (घटस्थापना):
    • प्रातः स्नान के बाद शुद्ध स्थान पर मिट्टी बिछाकर उसमें जौ बोएँ।
    • उस पर एक पात्र रखें जिसमें जल, सुपारी, सिक्का और आम का पत्ता डालें।
    • ऊपर नारियल रखकर कलश को लाल वस्त्र से ढक दें।
  2. माँ शैलपुत्री का आवाहन:
    • कलश स्थापना के बाद माँ शैलपुत्री की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
    • लाल या पीले फूल, अक्षत, रोली और चंदन से माँ का पूजन करें।
  3. मंत्र-जप:
    • माँ शैलपुत्री का बीज मंत्र है —
      “ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥”
    • इस मंत्र का 108 बार जप करने से जीवन में स्थिरता और शांति आती है।
  4. भोग और आरती:
    • माँ को शुद्ध घी का भोग लगाएँ।
    • दीप प्रज्वलित करें और दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।
    • अंत में आरती करें।

पूजा का फल और महत्व

  • माँ शैलपुत्री की पूजा से साधक को साहस, धैर्य और स्थिरता प्राप्त होती है।
  • यह दांपत्य जीवन में सुख और सामंजस्य बनाए रखती हैं।
  • इनकी साधना से मूलाधार चक्र जाग्रत होता है, जिससे ऊर्जा, आत्मविश्वास और जीवनशक्ति बढ़ती है।
  • भक्त की हर तरह की बाधा और कठिनाई धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है।

आध्यात्मिक महत्व

माँ शैलपुत्री की पूजा करने से मन की स्थिरता, शांति और दृढ़ता प्राप्त होती है। वे मूलाधार चक्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। इस चक्र की साधना से जीवन में ऊर्जा और शक्ति का संचार होता है।
माना जाता है कि इनकी आराधना से साधक को अध्यात्मिक उन्नति, दांपत्य सुख और अडिग आत्मविश्वास प्राप्त होता है।

प्रतीकात्मक अर्थ

  • त्रिशूल : तीन गुणों (सत्व, रज, तम) पर नियंत्रण।
  • कमल : निर्मलता और शुद्धि।
  • वृषभ : धर्म और परिश्रम का प्रतीक।
  • अर्धचंद्र : मन और भावनाओं पर नियंत्रण।

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नवरात्रि के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि वे शक्ति का मूल स्रोत हैं। उनकी साधना से जीवन में स्थिरता आती है और साधक आगे की साधना के लिए तैयार होता है। माँ शैलपुत्री का अवतार हमें यह सिखाता है कि चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियाँ हों, अगर संकल्प अडिग हो और भक्ति सच्ची हो तो कोई भी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।

Sumrit Shaw

Sumrit Shaw sindhkhabar.com के एक युवा और ऊर्जावान हिंदी पत्रकार व कंटेंट क्रिएटर हैं। वे निष्पक्ष और गहराईपूर्ण खबरों के लिए जाने जाते हैं। समसामयिक विषयों, राजनीति और समाजिक मुद्दों पर उनकी लेखनी हमेशा तथ्यपूर्ण व पाठकों के लिए उपयोगी रहती है।

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