America-India रिश्तों में बदलाव की उम्मीद
America-India के बीच व्यापारिक रिश्तों पर पिछले कुछ महीनों में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं, लेकिन अब तस्वीर बदलती नज़र आ रही है। हाल ही में हुई बातचीत के बाद यह उम्मीद बढ़ गई है कि अमेरिका भारत पर लगाए गए भारी टैरिफ को कम कर सकता है। यह खबर एक ओर जहां भारतीय निर्यातकों और व्यापारिक जगत के लिए सकारात्मक संकेत देती है, वहीं दूसरी ओर अभी भी कई ऐसे सवाल हैं जो इस प्रक्रिया के भविष्य को अनिश्चित बनाते हैं।
कैसे बढ़ा टैरिफ और किसे हुआ नुकसान
जुलाई और अगस्त 2025 में अमेरिका ने भारत पर 25 प्रतिशत का ‘reciprocal tariff’ लगाया था, साथ ही रूस से सस्ता तेल खरीदने के कारण ‘penal tariff’ भी लगाया गया। इसका सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ा और कई सेक्टर जैसे टेक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वेलरी, ऑटो कंपोनेंट्स और आईटी हार्डवेयर को नुकसान झेलना पड़ा। भारतीय कारोबारी संगठनों ने इसे अनुचित बताया और सरकार पर दबाव बनाया कि वह अमेरिका से बातचीत करे। अब जब यह बातचीत शुरू हुई है और कुछ हद तक सकारात्मक भी रही है, तो उम्मीद है कि नवंबर के अंत तक penal tariff पूरी तरह हटाया जा सकता है और reciprocal tariff को 25 प्रतिशत से घटाकर 10-15 प्रतिशत के बीच लाया जा सकता है।
सरकार के बयान और सकारात्मक संकेत
भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंता नागेश्वरन ने भी हाल ही में कहा कि वार्ता ‘positive और forward-looking’ दिशा में जा रही है। यह बयान इस ओर इशारा करता है कि दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की इच्छाशक्ति मौजूद है। साथ ही वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी माना कि अमेरिका के साथ व्यापारिक वार्ता सही दिशा में आगे बढ़ रही है और आने वाले दिनों में ठोस नतीजे सामने आ सकते हैं। यह सभी संकेत भारतीय उद्योग जगत के लिए राहत भरे हैं क्योंकि उच्च टैरिफ ने पिछले कुछ महीनों में निर्यात की गति को धीमा कर दिया था।
भू-राजनीतिक दबाव और चुनौतियाँ
हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया का दूसरा पहलू भी है। अमेरिका ने penal tariff मुख्य रूप से इसलिए लगाया था क्योंकि भारत ने रूस से ऊर्जा खरीदना जारी रखा था, जो कि अमेरिका की भू-राजनीतिक रणनीति के खिलाफ जाता है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या सिर्फ वार्ता से टैरिफ घटाया जा सकता है या भारत को अपनी ऊर्जा नीति और विदेश नीति में भी कुछ बदलाव करने पड़ेंगे। यदि भविष्य में अमेरिका को लगे कि भारत उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप काम नहीं कर रहा, तो यह राहत अस्थायी भी साबित हो सकती है।
अमेरिकी राजनीति का दबाव
इसके अलावा अमेरिकी घरेलू राजनीति का असर भी इस प्रक्रिया पर पड़ेगा। अमेरिका में व्यापारिक समूह और कुछ राजनीतिक धड़े मानते हैं कि भारत पर कड़े टैरिफ बनाए रखना अमेरिकी उद्योगों के लिए फायदेमंद है। ऐसे में अमेरिकी प्रशासन पर दबाव होगा कि वह भारत को ज्यादा रियायत न दे। यह पहलू भारत के लिए चिंता का विषय बना हुआ है क्योंकि यदि अमेरिका के अंदर से विरोध बढ़ा तो टैरिफ कटौती का रास्ता कठिन हो जाएगा।
भारत के लिए अवसर और संभावनाएँ
फिर भी, भारत के लिए यह अवसर है कि वह अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले जाए। यदि टैरिफ में कमी होती है तो न सिर्फ भारतीय निर्यातकों को राहत मिलेगी बल्कि अमेरिकी उपभोक्ताओं को भी भारतीय उत्पाद सस्ते में मिल सकेंगे। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ेगा और आर्थिक साझेदारी मजबूत होगी। वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनावों के बीच ऐसी कोई भी सकारात्मक प्रगति पूरी दुनिया के लिए राहत की खबर होगी।
उम्मीद की किरण
समग्र रूप से देखें तो स्थिति अभी नाजुक है लेकिन संभावनाएँ उज्ज्वल हैं। भारत और अमेरिका दोनों ही इस समय अपने हित साधने में लगे हैं और यदि वार्ता सही दिशा में आगे बढ़ी तो अगले कुछ महीनों में दुनिया गवाह बन सकती है कि कैसे दो बड़े लोकतंत्र व्यापारिक तनाव कम करके सहयोग की नई इबारत लिखते हैं। भारत के लिए यह सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक मायनों में भी एक बड़ी उपलब्धि होगी, जबकि अमेरिका के लिए यह रिश्ते सुधारने और इंडो-पैसिफिक में अपने प्रभाव को संतुलित रखने का मौका होगा। इसीलिए, भले ही इस पूरी प्रक्रिया में अभी कई अनिश्चितताएँ बनी हुई हैं, लेकिन फिलहाल इतना कहना गलत नहीं होगा कि उम्मीद की किरण नज़र आने लगी है और आने वाले समय में यह दोनों देशों के लिए एक नया अध्याय खोल सकती है।





