Rahul gandhi के ‘वोट चोरी’ आरोपों पर चुनाव आयोग ने दिया जवाब: क्या है पूरा मामला? पिछले कुछ हफ्तों में राज्य-स्तर पर मतदाता सूची से नाम हटाये जाने के गंभीर आरोप लगाये हैं। उनका कहना है कि कर्नाटक के अलंद विधानसभा क्षेत्र में लगभग 6,018 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। राहुल का आरोप है कि यह प्रक्रिया सॉफ्टवेयर और फर्जी लॉग-इन के माध्यम से हुई और इसमें बाहरी मोबाइल नंबरों से भेजे गए फॉर्मों का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल तकनीकी गड़बड़ी नहीं बल्कि एक सुनियोजित “वोट चोरी” है जिसका असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है।
राहुल गांधी ने यह भी दावा किया कि कर्नाटक की CID ने पिछले 18 महीनों में चुनाव आयोग को 18 पत्र भेजे, जिनमें आईपी लॉग, ओटीपी ट्रेल और मतदाता नाम हटाने से जुड़ी तकनीकी जानकारी माँगी गई, लेकिन आयोग ने संतोषजनक जवाब नहीं दिया। उनका आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया का सबसे ज्यादा नुकसान दलित, अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्गों के मतदाताओं को झेलना पड़ा, जिन्हें व्यवस्थित तरीके से निशाना बनाया गया।
चुनाव आयोग ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है और इन्हें “गलत और बेबुनियाद” बताया है। आयोग का कहना है कि कोई भी आम नागरिक ऑनलाइन जाकर किसी का नाम मतदाता सूची से हटा नहीं सकता। मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया केवल निर्धारित कानूनी नियमों और सुनवाई के बाद ही पूरी की जाती है। आयोग ने यह भी कहा कि अलंद विधानसभा क्षेत्र में 2023 में मतदाता नाम हटाने के कुछ प्रयास जरूर हुए थे लेकिन वे असफल रहे। इस मामले में एफआईआर भी दर्ज की गई थी ताकि जांच हो सके। आयोग ने राहुल गांधी से आग्रह किया था कि वह अपने दावों को प्रमाणित करने के लिए शपथ पत्र और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करें, लेकिन निर्धारित समयसीमा तक ऐसा कोई दस्तावेज आयोग के पास नहीं पहुँचा।
चुनाव आयोग का यह भी कहना है कि मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाने जैसी कोई घटना साबित नहीं हुई है। वहीं, राहुल गांधी का कहना है कि यदि आयोग निष्पक्ष है तो उसे सभी तकनीकी विवरण सार्वजनिक करने चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने में विफल हो रहा है और उन ताकतों की रक्षा कर रहा है जो लोकतंत्र को कमजोर कर रही हैं।
इस पूरे विवाद ने राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है। कांग्रेस पार्टी और कर्नाटक सरकार के कई नेता राहुल गांधी के साथ खड़े होकर इस मामले में विस्तृत जांच की मांग कर रहे हैं। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और कई मंत्रियों ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग ने राज्य की एजेंसियों को सहयोग नहीं किया और महत्वपूर्ण डेटा उपलब्ध नहीं कराया। दूसरी ओर, चुनाव आयोग और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी का कहना है कि उन्होंने सभी जरूरी रिपोर्ट और जानकारी साझा की है।
फिलहाल, यह मामला आरोप और प्रत्यारोप के बीच उलझा हुआ है। एक ओर राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी कह रही है कि “वोट चोरी” के प्रमाण हैं और लाखों मतदाताओं का लोकतांत्रिक अधिकार छीना जा रहा है, जबकि चुनाव आयोग इस पूरे विवाद को बेबुनियाद बताकर खुद को साफ कर रहा है। अदालतों में भी कुछ याचिकाएँ दाखिल हुईं लेकिन उन्हें खारिज कर दिया गया, जिससे आयोग के रुख को मजबूती मिली।
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स्थिति यह है कि अभी तक कोई निर्णायक नतीजा सामने नहीं आया है। यदि भविष्य में न्यायालय या कोई स्वतंत्र जांच एजेंसी आईपी लॉग, ओटीपी ट्रेल और सॉफ्टवेयर से जुड़ी तकनीकी जांच करती है तो सच्चाई और स्पष्ट हो सकती है। तब तक यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित है।





